हैदराबाद मच्छरों के हवाले: क्या सिर्फ फोटो अपलोड करने से शहर बचेगा?
हैदराबाद महानगर आज एक गंभीर लेकिन उपेक्षित संकट से गुजर रहा है — मच्छरों का अनियंत्रित प्रकोप। शहर की गलियों, बस्तियों, नालों, खाली प्लॉटों और कचरा स्थलों पर मच्छरों की पैदावार इस कदर बढ़ चुकी है कि आम नागरिकों का जीना मुश्किल हो गया है। चिंता की बात यह है कि अभी बरसात का मौसम भी शुरू नहीं हुआ, जो सामान्यतः मच्छरों के प्रजनन का अनुकूल समय माना जाता है। जब अभी यह भयावह स्थिति है, तो आने वाले मानसून में हैदराबाद किस आपदा का सामना करेगा, इसकी कल्पना मात्र से नागरिक सिहर उठते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि नगर निगम की मच्छरनाशक छिड़काव टीम आखिर कर क्या रही है?
कागजों में, मोबाइल एप में और फोटो रिपोर्टों में तो नियमित फॉगिंग, एंटी-लार्वा स्प्रे और सैनिटेशन ड्राइव दिखाई जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। मोहल्लों में रहने वाले लोगों का कहना है कि छिड़काव करने आने वाले कर्मचारी कई बार सिर्फ औपचारिकता निभाकर चले जाते हैं। कहीं मशीन चालू कर दो मिनट धुआं छोड़ दिया, कहीं फोटो खिंचवा ली, कहीं उपस्थिति दर्ज कर दी — और काम पूरा मान लिया गया। नालियों के किनारे, पानी जमा होने वाले हिस्सों, कूड़ा ढेरों और अंदरूनी गलियों में वास्तविक निरीक्षण करने का श्रम शायद अब विभागीय संस्कृति का हिस्सा ही नहीं रहा।
स्थिति और भी चिंताजनक तब हो जाती है जब यह देखा जाता है कि स्वच्छता टीम केवल तभी सक्रिय होती है जब डेंगू, चिकनगुनिया या अन्य मच्छरजनित बीमारी का कोई आधिकारिक केस अस्पताल से दर्ज होकर आता है।
यानि बीमारी फैलने से पहले रोकथाम नहीं, बल्कि बीमारी फैलने के बाद दिखावटी हलचल! यह व्यवस्था किसी जनस्वास्थ्य नीति की नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की परिचायक है। क्या नगर प्रशासन का काम केवल मरीज गिनना रह गया है? क्या नागरिकों की सुरक्षा का अर्थ सिर्फ फाइलों में आंकड़े अपडेट करना है?
हैदराबाद में इन दिनों एक और विडंबना सामने आ रही है — “स्वच्छता एप” और “सिटी क्लीन” जैसे डिजिटल अभियानों का प्रचार तो जोर-शोर से किया जाता है, लेकिन नागरिकों द्वारा की गई शिकायतों पर कार्रवाई लगभग शून्य है।
सरकार और अधिकारी दावा करते हैं कि नागरिक कहीं भी कचरा, गंदगी, पानी भराव या मच्छरों के प्रजनन स्थल की फोटो अपलोड करें, तुरंत एक्शन लिया जाएगा। लेकिन जनता का आरोप है कि शिकायतें सिर्फ पोर्टल पर दर्ज होकर रह जाती हैं। न निरीक्षण, न सफाई, न जवाबदेही। कई मामलों में शिकायत बंद दिखा दी जाती है जबकि स्थल की हालत जस की तस रहती है। यदि तकनीक का उपयोग केवल सरकारी उपलब्धि दिखाने के लिए है, समाधान के लिए नहीं, तो ऐसे एप नागरिकों के साथ मजाक से कम नहीं।
साफ दिखाई दे रहा है कि स्वच्छता विभाग के अनेक कर्मचारी फील्ड वर्क की बजाय मोबाइल वर्क में अधिक रुचि रखते हैं।
फोटो क्लिक करो, लोकेशन टैग करो, अपलोड करो, रिपोर्ट क्लोज करो — बस।
लेकिन क्या कभी किसी अधिकारी ने यह जांचने की कोशिश की कि जिन गलियों को “क्लीन” दिखाया गया, वहां सचमुच सफाई हुई या नहीं? क्या जिन इलाकों में फॉगिंग दर्ज है, वहां मच्छरों की संख्या कम हुई? यदि नहीं, तो यह पूरा सिस्टम केवल डिजिटल धोखाधड़ी और जनता को भ्रमित करने का माध्यम बन चुका है।
आज जरूरत इस बात की है कि जीएचएमसी के वरिष्ठ अधिकारी, स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लें।
मच्छरनाशक छिड़काव कर्मचारियों की दैनिक मॉनिटरिंग हो, फील्ड निरीक्षण की स्वतंत्र टीम बने, शिकायत एप पर आई हर रिपोर्ट का भौतिक सत्यापन हो, और लापरवाही करने वाले कर्मचारियों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। सिर्फ बैठकों, प्रेस नोटों और एप लॉन्च से शहर स्वच्छ नहीं होता; उसके लिए पसीना बहाना पड़ता है, गलियों में उतरना पड़ता है, और जनता के बीच जवाब देना पड़ता है।
